मानव इतिहास के युग में ये युग हमेशा यादगार के रूप में दोहराया जाएगा, इस युग की गाथाएं एक अमर कहानी बन जाएगी I ऐसा बोलने के पीछे एक पुख्ता तथ्य है जिसे कुछ इस तरह से समझा जा सकता है, जैसे विकसित देशों में हर तरह के कयादे कानून बने है जिसका पालन वहा के नागरिक करते है और वो उनकी आदत मे शामिल हो जाता है, परन्तु भारत में कितने भी कायदे कानून क्यो ना बना लिए जाए सिर्फ़ उसका उपहास ही किया जाता रहा है, जैसे "कचारा" एक शब्द नहीं बल्कि एक सभ्यता का प्रतीक है कि वो किस तरह का है, और कहां से आ रहा है और कहा जाके समाहित होगा ? कुछ कचारा जो दिखता है, जिसका कोई ना कोई निस्तारण संभावित है परंतु उसका क्या जो दिखता नहीं I भारत देश पुरजोर लग के जुटा हुआ है दिखने वाले कचरे को साफ कैसे किया जाए I ना दिखने वाले कचरे को साफ करने की कोई विधि नहीं खोजी गई है जिसका नाम "मानसिक कचरा" है I मज़े की बात ये है कि ये हाइड्रोजन एवं एटम बम से भी ज़्यादा विकिरण छोड़ जाता है जिसके प्रभाव को कई सदियों मे भी नहीं मिटाया जा सकता है.
थोड़े शब्दो मे कहा जाए तो भारत के अधिकतर साक्षर तबके के लोग जिसकी तादाद 75% से अधिक है जो अपना सारा मानसिक कचारा निकाल रहे है वो भी तकनीकी की मदद से, जो सरल और सहज है परन्तु इसका प्रभाव बहुत ही भयंकर होता जा रहा है I जिसे जाने अनजाने मे नज़र अन्दाज़ किया जाता है, इसपर तब कान बज़ते जब चारो तरफ शोरगुल का माहौल बन जाता है, आज की इतनी बड़ी आबादी जो असल में सिर्फ़ साक्षर है Social media मे रोज़ मानसिक कचरे के अंबार लगा रही हैं, अपनी रोज़-मर्रा की ज़िन्दगी के हर पल को Social media मे बड़े मज़े से उछाल रहे हैं, वो बिना सोचे समझे, कि वो क्या सोचते है, क्या खाते है, क्या पहनते है, क्या पीते है, किसके साथ घूमते है, किसके साथ सोते है, किसके साथ चिपकते, किसको प्यार करते है, किससे नफ़रत करते हैं, किसके Pachup हुआ, किससे breakup हुआ, कितना गन्दा विचार है उनके अंदर, कितनी गालियाँ दे सकते हैं, कितने दुखी है, कितने खुश हैं, उनके अंदर कितना कितना जातिवाद का जहर है, और अन्य इस तरह की चीज़ों का सही तरीके से विश्लेषण किया जाए तो पाएंगे कि अच्छी चीज़ों के लिए शायद सोशल मीडिया मे जगह बहुत कम हैं, हर इंसान दिन के उजाले मे संत है और रात के अंधेरे में सोशल मीडिया मे भोग विलाषीता मे लीन है, जिसके कारण दिमाग में कचारा भरता जा रहा और Facebook, whatsapp, Instagram, Twitter, YouTube, snaptube etc मे उनका मानसिक कचारा रोज़ दिखता है, कहा जाता है कि सोशल मीडिया एक honest watching dog है, पर इसकी हालत बिल्कुल बिकाऊ हो गई हैं, इसकी वफादारी पर यकीन करना मतलब अंधेरे में तीर चलाने जैसा है I परंतु आज पूरा देश इन्ही के फेके हुए कचरे को उठा के खाने में लगा हुआ है पूरा समाज, जो हज़म नहीं हो पाता तो दूसरे रूप में फिर सोशल मीडिया मे विकराल रूप लेकर आता है और समाज को दूषित और बदबूदार बना रहा है I
ये social media का concept एक निष्पक्ष विधि के अनुसार तैयार किया गया था, पर सबसे ज्याद पक्षपात यही करता रहा है, और ये निम्न से लेकर उच्च इकाई तक है, कोई इससे अछूता नहीं रह सका I आज की साक्षर युवा पीढ़ी को वाकई मे जरूरत है मानक रूप से शिक्षित होने की, तभी अन्तर समझ आ सकता कि समावेशी और गैर समावेशी मे अन्तर क्या होगा I इस दौर में बुद्धिमान होने से काम नहीं चल सकता है अपितु विवेकशील होना होगा, वर्ना ये मानसिक कचरा रूपी दिमाग के साक्षर लोग मुट्ठी भर शिक्षित लोगो को दीमक की तरह खा के खतम कर देंगे I साक्षर समाज के बहुतायत लोगो शिक्षित समाज के लोगो की उपासना शायद तब तक नहीं कर सकते जब तक दोनों के अन्तर को ना समझे I
दूसरा एक और पहलू भी है जिससे हम सब भली भातीं परिचित हैं जो सोशल मीडिया के कचरे को नष्ट करके खाद के रूप में अच्छा उत्पाद भी हमें देता है पर अनुपात बहुत कम हैं I जिसपर अगले लेख मे प्रकाशित तथ्य रखे जाएंगे I
ये एक निष्पक्ष विचार है जिसका किसी व्यक्ति विशेष से कोई संबंध नहीं है यदि संबंध हो तो मात्र एक संयोग माना जाएगा I
लेखक :-
Er.RAMSINGH (PRESIDENT)
dmsafe01@gmail.com
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