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Showing posts from March, 2024

CH-40: वो लम्हे.....

वो लम्हे......... कुछ यादें भी ऐसी होती हैं जिन्हे हम भूला भी नहीं सकते और याद भी रखने में मुश्किल होती हैं, कुछ लोग भी इन्ही यादों की तरह ही होते है, जिन्हे हम हर पल महसूस तो कर सकते हैं, पर वो पास नहीं होते, और पास होके भी इतनी दूर होते हैं, कि उन तक पहुंच पाना नामुमकिन सा हो जाता है, पूरी उम्र निकल जाती हैं इनको जतन से रखने में, फिर भी रेत के ढेर की तरह मुट्ठी से कब फिसल गए एहसास भी नहीं होता, उनको भी पता तब चलने लगता है जब वो किसी मंज़िल की तलाश में निकल जाते है, फिर जब खाली हाथ लौटने के बाद देखते हैं जिनको हम छोड़ गए इस उम्मीद में कि वापसी में होंगे उसी मोड़ पर, वहा सिवा उसके सब जस के तस मौजूद होते हैं, और उनको सब पता होता होते हुए भी बेबस लाचार होके तमासे का हिस्सा मात्र ही रह जाते है, और अंदर ही अंदर बहुत पीड़ा का आभास भी करते हैं..... सार ये है कि सही काम को सही समय पर अंज़ाम तक पहुंचा देना ही बुद्धिमता है, इंतज़ार इस लिए कि समय आने पर हो जाएगा, परंतु ना वो समय आता है और नहीं वो कार्य...... तो वक्त की नज़ाकत को समझते हुए चाहे रिश्ते हो या कम संभाल लेना ही इंसानियत क...

CH-33: मुझे राजनीतिज्ञ बनना है

राजनीति से युवा भाग रहे है और हवा में सिक्का उछाल के किस्मत आज़मा रहे हैं मुझे राजनीतिज्ञ बनना है राजनीति का ज्ञाता राजनीतिज्ञ ? संधि-विच्छेद राज+ नीति =राज करने की नीति ........! राजनीतिज्ञ बनना कोई आसान काम तो नहीं है रखना पड़ता है ध्यान छोटी-छोटी बातो का अपने घर से लेकर पड़ोसियों के घर तक का अपने ही घर में रहना पड़ता है जासूसों की तरह समझना पड़ता है सदस्यों के बदलते व्यवहार को कौन क्या कह रहा है क्यों कह रहा है किस परिस्थिति में कह रहा है रखनी पड़ती है इस पर पैनी नज़र, जमीन-जायदाद का बंटवारा औरतो का पुरुषो को भड़काना पुरुषो का फिर आपस में लड़ना ये भी तो राजनीति का ही एक हिस्सा है l जरूरत के हिसाब से तय होते हैं घरो में भी रिश्ते किसका कितना प्रभुत्व है किसके पास कितनी दौलत है यही तय करता है कि किसको किससे कितना बोलना है कब बोलना है, यहां भी तो यह तय होता है बैठको में जो कभी-कभी घर के आँगन में होती है तो कभी एक बंद कमरे की चारदीवारी में, क्यों देते हैं दोष लोग राजनेताओ को कि वो राजनीति का खेल खेलते हैं जबकि सच तो ये है कि राजनीति हम सब इंसानो के खून में ही है, हाँ ऐसा हो सकता है...

CH-39: पैसा दर्द भी और दवा भी "

पैसा दर्द भी और दवा भी " पैसा ना हो तो दर्द हज़ारों तरह के होते हैं, पर पैसे की कमी का दर्द प्यार से सुलझ जाता है परंतु हम इंसान उस पैसे की कमी को इतना दर्द मे बदल दिया करते है बस अपने स्वार्थ वश, रिश्तों में इतनी कड़वाहट भर जाती हैं कि निलकंठ बनके भी नहीं जी नहीं पाता इंसान वो इतना कड़वा होता है, वो जो नीलकंठ बनने पर मजबूर करता है वो कोई बहारी नहीं आपके सबसे करीबी होते हैं, वो जहर देने लगते हैं, आपके स्वाभिमान को अपनी कठोर अप शब्द वाणी से हमेशा तार तार कर देते हैं, और रिश्तों की मर्यादा को पार कर कुछ विकराल रूप मे तब्दील हो जाते हैं, सामाजिक दृष्टिकोण इतना गिर जाते है की पूरा जीवन बीत जाता है उस स्थान को दुबारा हासिल करने में, जिस बीमारी को हम थोड़ा सह के, मुस्कुरा के, थोड़ी से कमियों को झेल के, थोड़ा कम अच्छा दिन बिता के प्यार से खत्म किया जा सकता था पर हमने क्या किया I पैसे का दर्द समय पूरा जरूर कर देता है परंतु स्वाभिमान को गिरा देने का दर्द कभी नहीं जाता, हमारा भारतीया समाज कुछ ऐसा ही बन चुका है, मेरे अनुभव में मैंने अक्सर पाया है लोगो की बढ़ती महत्वकांक्षा कही न...

CH-38: प्रकृति सृजन करती है तो उसे विनाश करना भी आता है.

प्रकृति सृजन करती है तो उसे विनाश करना भी आता है. ****************************************** हमारी दुनिया जबसे बनी है लाखों बार तबाह हुई है हजारों बार बर्बाद हुई है और सैंकड़ों बार नष्ट हुई है धरती की इस विनाशलीला के सबूत आज भी धरती पर मौजूद है लेकिन ये भी सत्य है कि हर विध्वंश के बाद धरती पर नया सृजन हुआ है धरती हर विनाश के बाद बदली है और इस बदलाव ने हर बार सृजन का नया अध्याय भी लिखा है. धरती पर कभी डाइनासोरों का एकछत्र राज हुआ करता था उस समय पृथ्वी पर डाइनासोर की हजारों प्रजातियां थी जिनके बीच शिकार और शिकारी का खेल जारी था. एक तरफ था धरती का एकमात्र विशाल महाद्वीप पैंजिया और दूसरी ओर था विशाल समुद्र. इस पैंजिया लैंड में रहने वाले जीवों की हजारों प्रजातियों में 90 प्रतिशत जीव डाइनासोर की प्रजाति के ही थे जिनमें कुछ शाकाहारी थे कुछ उड़ने वाली प्रजातियां थी और कुछ मांसाहारी डाइनासोर थे जो उस समय भोजन श्रृंखला में सबसे ऊपर थे ! धरती पर 80 करोड़ वर्षों तक हुकूमत करने वाले इन विशाल जानवरों का पतन होने के लिए बस एक क्षण ही काफी था ये वो पल था जब धरती से विशाल धूमकेतु टकराया और देख...

CH-34: Dumping Earth 🌏

इक्कीसवीं सदी का कचरा यानी टिक टिक करता टाइम बम:- पिछले कुछ वर्षों से निश्चिरूप से पर्यावरण के बारे में जागरूकता काफी बढी है और यह शुभ संकेत है - विशेषकर भारत जैसे आबादी बहुल देश के लिए , जहाँ कृषि और उद्योग के कारण धरती पर बहुत अधिक दबाव पड़ता है और इस दबाव के दुष्प्रभाव खतरनाक होते है. ऐसी स्थिति में पर्यावरण के मुद्दे को गंभीरता से लेने की जरूरत है ताकि आने वाली पीढी के लिए हम अपने इस सबसे सुंदर ग्रह पृथ्वी को सुरक्षित रख सकें. एक पुराना जुमला है- ‘We do not inherit the Earth from our ancestors ; we borrow it from our children!’ धरती हमारे पुरखों की अमानत नही है बल्कि हमारे अपने बच्चों का कर्ज है हमपर. हमारा हर एक छोटा कदम हमारी धरती और इसके भविष्य को प्रभावित करता है. अगली पीढ़ी के लिए यह हमारा कर्तव्य है कि अपनी पीढ़ी के द्वारा पैदा की गई समस्यायों को सुलझाएं. आइये , इस संदर्भ में हम अपने आसपास के पर्यावरण का और धरती के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी का आकलन करे.आमतौर पर, पर्यावरण पर हमारी चर्चा शहरों के प्रदूषण और स्वच्छता को लेकर शिकायत के तहत होती है कि कैसे हर छोटी से छोटी जगह कूडे-कचरे ...

CH-37: डॉ. अंबेडकर का स्त्रीवाद (एक विश्लेषणात्मक पुनरावलोकन )

डॉ. अंबेडकर का स्त्रीवाद (एक विश्लेषणात्मक पुनरावलोकन  स्त्री सशक्तिकरण के प्राचीन दस्तावेजों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि इसकी शुरुआत महात्मा गौतम बुद्ध की विरासत से हुई और सम्राट अशोक के काल में विकसित रूप धारण किया । आगे चलकर भारत के अलग-अलग कालों के अलग-अलग महापुरुषों ने इस महत्वपूर्ण आंदोलन को जारी रखा, उसमें से इस आंदोलन के डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर आधुनिक भारतीय कालखंड के सबसे महत्वपूर्ण अग्रदूत थे । पर इस आंदोलन के आद्य प्रवर्तक के रूप में महात्मा जोतिबा फुले ने सबसे पहले नीव रखी । उन्हीं से प्रेरणा लेकर और उन्हीं को वैचारिक गुरु बनाकर डॉ.अंबेडकर ने इस आंदोलन को लोकतांत्रिक देश में सफल बनाने की कोशिश की । स्वतंत्र भारत का समकालीन स्त्री आंदोलन महिलाओं की उपेक्षा, शोषण, और श्रम में लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त करने तथा बराबरी के सिद्धांत का दृढ़तापूर्ण पालन करने की नीति के साथ शुरू हुआ । 20 वी सदी के पूर्वार्ध में स्त्री के माँ रूप का प्रतीक उभरा नारी शक्ति के अनुसार राष्ट्रमाता के रूप में रक्षा करने वाली उग्र रूपधारिणी महाकाली के रूप में देखा गया । 20 वी स...

CH-35: "मैं आरक्षण बोल रहा हूँ"

"मैं आरक्षण बोल रहा हूँ" मैं आरक्षण बोल रहा हूँ, राज सभी के खोल रहा हूँ । जो कहूँगा सच कहूँगा, मेरा किसी से नहीं लगाव है और न ही बैर भाव है । मेरा इतिहास पुराना है, मैं आधुनिक़ता का अहंकार नहीं हूँ ।मेरा जन्म राज परिवार में हुआ, जिसका अर्थ और अनर्थ से कोई नाता नहीं था । मैं जातिवाद में पला-बढ़ा, राजा महाराजों और धर्म के ठेकेदारों ने मुझे पाला-पोषा । मैं उनके दम्भ और अहंकार का प्रतीक था, मैं जन्म से लेकर मृत्यु तक उनसे चिपका रहा । मुझे ऋषि-मुनियों से ज्ञान मिला, मनुस्मृति ने मुझे राह दिखाई और मेरा यौवन आ गया । मैंने भू-सुरों के जन्म के लिए मुख में शरण ली। रक्षकों के जन्म के लिए भुजाओं में वास किया । पालक और पोषण की व्यवस्था को मैंने उदर से जन्मा और सेवा कर्म के लिए मैंने वास्तविकता अर्थात शूद्रों को चुना । पहले मैं शक्ति की शरण में था, फिर भक्ति की शरण में आ गया । मैंने धर्म की आड़ में मंदिर में आश्रय पाकर पूरी ब्राह्मण जाति को पाला, और आज लोकतांत्रिक युग में भी पाल रहा हूँ। मैंने गुंडागिर्दी और सत्ता के बल पर क्षत्रिय जाति को ज़मीदार बनाया, और आज भी बदस्तूर जा...

CH-36: "पानी"

पानी " एक ग्लास में थोड़ा पानी रखा हुआ था, कुछ कि नज़र में आधा भरा और कुछ कि नज़र में आधा खाली होगा, ये उस ग्लास में रखे हुए पानी को देखने के नज़रिए पर आश्रित है, परंतु सवाल कुछ अलग है, मेरे लिए ये माँयने नहीं रखता की कितना खाली या भरा है, बात इतनी सी है कि वो कितना भारी है, अब सवाल आता है कि आप उसे थोड़े समय के लिए हाथ में रखेंगे तो हल्का होगा, थोड़ा और देर तक उठा के रखा रहे तो कुछ भारीपन आएगा, थोड़ा और देर तक उठा के रखा जाए तो थोड़ा और भारी होगा और थोड़ा बहुत हाथ में शायद दर्द महसूस हो, यदि 24 घंटे तक हाथ में उठा के लगातार रखा जाए तो क्या होगा ? उस समय जरूरत से ज्यादा भारी और तनाव से भरा, उलझन बहुत महसूस होने लगेगी, जबकि ग्लास में रखे हुए पानी का वजन उतना अब भी है जितना पहले था, हमे शुरुआत में भारहीन, फिर वक्त बढ़ता गया और भारीपन भी साथ साथ बढ़ता गया, शायद मै बिल्कुल सही हूँ :- अब हम इस बात जो जीवन से जोड़ कर देखे फिर ऊपर लिखी बात का मक़सद स्पष्ट समझ में आएगा, आइए हम समझते हैं ये क्या है ? जीवन में तनाव और चिंता बिल्कुल उसी ग्लास में रखे हुए जल की ही तरह हैं, जितना ...