वो लम्हे.........
कुछ यादें भी ऐसी होती हैं जिन्हे हम भूला भी नहीं सकते और याद भी रखने में मुश्किल होती हैं, कुछ लोग भी इन्ही यादों की तरह ही होते है, जिन्हे हम हर पल महसूस तो कर सकते हैं, पर वो पास नहीं होते, और पास होके भी इतनी दूर होते हैं, कि उन तक पहुंच पाना नामुमकिन सा हो जाता है, पूरी उम्र निकल जाती हैं इनको जतन से रखने में, फिर भी रेत के ढेर की तरह मुट्ठी से कब फिसल गए एहसास भी नहीं होता, उनको भी पता तब चलने लगता है जब वो किसी मंज़िल की तलाश में निकल जाते है, फिर जब खाली हाथ लौटने के बाद देखते हैं जिनको हम छोड़ गए इस उम्मीद में कि वापसी में होंगे उसी मोड़ पर, वहा सिवा उसके सब जस के तस मौजूद होते हैं, और उनको सब पता होता होते हुए भी बेबस लाचार होके तमासे का हिस्सा मात्र ही रह जाते है, और अंदर ही अंदर बहुत पीड़ा का आभास भी करते हैं..... सार ये है कि सही काम को सही समय पर अंज़ाम तक पहुंचा देना ही बुद्धिमता है, इंतज़ार इस लिए कि समय आने पर हो जाएगा, परंतु ना वो समय आता है और नहीं वो कार्य...... तो वक्त की नज़ाकत को समझते हुए चाहे रिश्ते हो या कम संभाल लेना ही इंसानियत की सही परिभाषा है..... जो चूक गया समझो ख़तम हुआ सब उसका, बस पछतावे के अलावा कुछ हाथ नहीं लगता.....
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