मैं आरक्षण बोल रहा हूँ, राज सभी के खोल रहा हूँ । जो कहूँगा सच कहूँगा, मेरा किसी से नहीं लगाव है और न ही बैर भाव है । मेरा इतिहास पुराना है, मैं आधुनिक़ता का अहंकार नहीं हूँ ।मेरा जन्म राज परिवार में हुआ, जिसका अर्थ और अनर्थ से कोई नाता नहीं था । मैं जातिवाद में पला-बढ़ा, राजा महाराजों और धर्म के ठेकेदारों ने मुझे पाला-पोषा । मैं उनके दम्भ और अहंकार का प्रतीक था, मैं जन्म से लेकर मृत्यु तक उनसे चिपका रहा । मुझे ऋषि-मुनियों से ज्ञान मिला, मनुस्मृति ने मुझे राह दिखाई और मेरा यौवन आ गया । मैंने भू-सुरों के जन्म के लिए मुख में शरण ली। रक्षकों के जन्म के लिए भुजाओं में वास किया । पालक और पोषण की व्यवस्था को मैंने उदर से जन्मा और सेवा कर्म के लिए मैंने वास्तविकता अर्थात शूद्रों को चुना ।
पहले मैं शक्ति की शरण में था, फिर भक्ति की शरण में आ गया । मैंने धर्म की आड़ में मंदिर में आश्रय पाकर पूरी ब्राह्मण जाति को पाला, और आज लोकतांत्रिक युग में भी पाल रहा हूँ। मैंने गुंडागिर्दी और सत्ता के बल पर क्षत्रिय जाति को ज़मीदार बनाया, और आज भी बदस्तूर जारी है । मैंने धन-धरती लूटकर शोषण किया और सारी वैश्य जाति को धनवान बनाया, मॉल और सुपर मार्केट के रूप में अब भी मैं उनके साथ खड़ा हूँ । शूद्रों को हमेशा मैंने सेवा का पाठ पढ़ाकर गुलामी, लाचारी और निकृष्ट जीवन जीने की राह दिखाई, अन्याय-अत्याचार, बहु बेटियोँ के साथ बलात्कार और उसे सहन करने की क्षमता प्रदान की । इस समय मैं जीवन की चरम ऊँचाइयों पर था, चारों तरफ उल्लास का माहौल था, देश मुगलों और अंग्रेजों का गुलाम होकर भी प्रगति पथ की ओर अग्रसर था और देश प्रगति कर "सोने की चिड़िया की बजाय गोबर का गणेश हो गया" गरीबी, भुखमरी, आतंकवाद, अलगाववाद, हत्या, लूट, बलात्कार, चोरी, डकैती और अन्याय-अत्याचार जैसी विकाशील योजनाएँ लागू हुईं ।
मैंने तीन वर्णों (15%) को समाज के हर पहलुओं में ऊंचाइयों तक पहुँचाया और एक वर्ण अर्थात शूद्र (85%) को मन के महाराजा और तन के गुलाम "शोषिताधिराज" की उपाधी प्रदान की । फिर शूद्रों में डॉ अम्बेडकर नामक महामानव का जन्म हुआ, जिसकी शरण पाकर मैं उसी प्रकार धन्य हो गया जिस प्रकार तथागत बुद्ध की शरण पाकर अंगुलिमाल हुआ और फिर मेरा हृदय परिवर्तन हो गया तदुपरांत मैं शोषितों के चँगुल में फंस गया और मैंने उच्च वर्णों की पीड़ा को बढ़ाया।
मैंने नीचों के लिए शिक्षा के मार्ग को सुगम बनाया, उनके लिए सामान शिक्षा की व्यवस्था कर नौकरियों में समान प्रतिस्पर्धा का माहौल तैयार किया जिससे नीच और शूद्र कहलाने वाले लोग मेरा आश्रय पाकर अच्छे पदों पर आसीन हुए । इससे धर्म को हानि हुई और मैंने ही जाति के आधार पर भेदभाव को जन्म दिया । इससे पहले जाति का नामोनिशान ही नहीं था । मैं जब जाति के आधार पर धर्म के साथ था तो सब कुछ अच्छा चल रहा था देश प्रगति पथ की और अग्रसर था । किन्तु मैंने अपने पूर्वजों की न सुनते हुए डॉ अम्बेडकर की बात मानकर जाति के आधार पर शूद्र जाति को लाभ पहुँचा दिया तबसे मैं देशद्रोही हो गया जिसका मुझे अफ़सोस है ?
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