पैसा दर्द भी और दवा भी "
पैसा ना हो तो दर्द हज़ारों तरह के होते हैं, पर पैसे की कमी का दर्द प्यार से सुलझ जाता है परंतु हम इंसान उस पैसे की कमी को इतना दर्द मे बदल दिया करते है बस अपने स्वार्थ वश, रिश्तों में इतनी कड़वाहट भर जाती हैं कि निलकंठ बनके भी नहीं जी नहीं पाता इंसान वो इतना कड़वा होता है, वो जो नीलकंठ बनने पर मजबूर करता है वो कोई बहारी नहीं आपके सबसे करीबी होते हैं, वो जहर देने लगते हैं, आपके स्वाभिमान को अपनी कठोर अप शब्द वाणी से हमेशा तार तार कर देते हैं, और रिश्तों की मर्यादा को पार कर कुछ विकराल रूप मे तब्दील हो जाते हैं, सामाजिक दृष्टिकोण इतना गिर जाते है की पूरा जीवन बीत जाता है उस स्थान को दुबारा हासिल करने में, जिस बीमारी को हम थोड़ा सह के, मुस्कुरा के, थोड़ी से कमियों को झेल के, थोड़ा कम अच्छा दिन बिता के प्यार से खत्म किया जा सकता था पर हमने क्या किया I पैसे का दर्द समय पूरा जरूर कर देता है परंतु स्वाभिमान को गिरा देने का दर्द कभी नहीं जाता, हमारा भारतीया समाज कुछ ऐसा ही बन चुका है, मेरे अनुभव में मैंने अक्सर पाया है लोगो की बढ़ती महत्वकांक्षा कही ना कही पूरी निजी व्यवस्था तो बर्बाद कर रहे हैं. आज हर व्यक्ति वण्डीज्याकृत बन चुका है I जहां पैसा (hot pocket) की बुनियाद पर सब आश्रित हो चुका है वो भी हर स्तर पर, इसका प्रभाव शहरी इलाके (metros city) से लेकर गाँवों तक देखने को मिलता है.
पैसा दवा भी बनता है जो हम खाते है और जिसे हम मेहसुस करते है, जीवन में 95% समस्याए पैसे के अभाव में आती हैं, बड़ी समस्या नहीं हुआ करती दरसल पैसा बड़ा बन चुका है, इसी लिए छोटी समस्या हमारे सामने बड़ी ही बनके आती हैं, और पैसा सब्र करना बिल्कुल नहीं जनता, जितनी रफ्तार से पैसा दौड़ता है इंसान भी उसी रफ्तार में दौड़ने की कोशिश में लगा है और बहुत से कामयाब हो जाते हैं परंतु उनकी कामयाबी कितनो के स्वाभिमान को खूचल का हासिल हुई ये हम कभी नहीं सोचते, हर चीज़ बिकाऊ नहीं थी पहले परंतु हर चीज़ का मोल हम इंसानो ने खुद ही तय कर दिया बाद में हम खुद की कहते है कि दुनिया कितनी बिकाऊ हो चुकी हैं. किसी को बिकने का का शौख कब था मैंने नहीं सुना कभी पर आज देखने को हर पल मिल रहा है, हर इंसान सिर्फ खुद को बेचने और दूसरों को खरीदने में लीन हुआ चला जा रहा. और ये बहुत सरलता पूर्वक हो जाता है आज, पहले नहीं हुआ करता था, पहले इंसान बहुत महगें था पर आज बहुत ही सस्ते हो गए हैं. आज कुछ महंगा है तो वो है भौतिकवाद जिसे खरीदने में हम बहुत कुछ अपना हम नीलाम कर देते हैं, तो देखो पैसा कितनी बड़ी दवा बन चुका है आज हमारे बीच l परंतु ये भी सच है जिसे हम झुठला नहीं सके दवा के दम पर सांसें तो मिल सकती हैं पर खुश्बू नहीं, दिल तक मिल जाते हैं परंतु मे रहने वाला नहीं मिलता, बिस्तर तो मिल जाता है परंतु नींद नहीं मिल सकती I
कमजोरी चाहे पैसा हो या प्यार दोनों ही विनाश की तरफ़ ही जाते हैं, जिस दिन इंसान की जरूरत पैसा और प्यार बन जाएंगे उस दिन ना दवा की ना ही दुआ की जरूरत होगी, दोनों जरूरतें मिलके सबके स्वाभिमान की रक्षा स्वयं ही करेंगी I
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धन्यवाद
-Er.RAMSINGH (PRESIDENT )
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