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CH-19: आत्महत्या (SUICIDE)

आत्महत्या (#SUICIDE) आ त्महत्या आज पूरी दुनिया में एक बड़ी समस्या बन चुका है, आंकडे के हिसाब से पूरी दुनिया में लगभग 8 लाख लोग आत्महत्या वार्षिक दर से कर रहे है जिसमे से सबसे ज्यादा भारत में लगभग 1.5 लाख लोग औसत दर से आत्महत्या कर रहे है , आत्महत्या एक बड़े अपराध से कम नहीं है और वाकई में खुद की जानलेना कोई आसन कम नहीं है ये अवस्था तभी आती है जब इन्सान का दिल और दिमाग पूरी तरह से निष्क्रिय हो जाता है कुछ बाहरी और आतंरिक करणों की वजह से I  हम पूरी दुनिया की नहीं भारत की बात करेंगे जिसमे कुछ गंभीर समस्याएँ है, जिसपर हम बात करेंगे I  जिसे हम दरकिनार कर देते है जिन कारणों से 15 - 39 उम्र तक के स्त्री एवं पुरुष आत्हत्या कर रहे है, अगर इसपर काबू नहीं किया गया तो हर घर के चार सदस्यों में से एक आत्महत्या से अपनी जान ले लेगा और हर घर की कहानी में एक मौत आत्हत्या की जरुर होगी I   भारत में आत्हत्या के दो प्रमुख कारण है जिसमे शिक्षा के क्षेत्र में फेलियर होना  और स्त्री-पुरुष के आपसी संबंधो को लेकर अन्य बहुत कारण है पर ये सबसे मुख्य कारण है जिसका हम पूर्ण र...

CH-18: #आश्रम#

#आश्रम# #OLD-AGE HOME शिष्ट भारत की एक तस्वीर अ क्सर ऐसा देखा गया है कि शादी के बाद ही वृध्दा आश्रम की जरूरत माँ-बाप को होती होती हैं, शादी के पहले माता-पिता आश्रम क्यों नहीं जाते, दूसरा ये भी देखा गया है की लड़के के माता-पिता को आश्रम जाना होता है, लड़की के माता-पिता को आश्रम जाते हुए नहीं देखा जाता, ये तब होता है जब लड़की के भाई की शादी हो जाए, तो वहां भी यही दृश्य नज़र आता है, जब तक शादी ना हो तब तक इसकी जरूरत क्यों नहीं पड़ती, देखा जाए तो लड़का अगर गलत होता तो ये काम शादी के पहले क्यों नहीं करता, इसका मतलब कुछ तो निकलता है और ये सोचने वाली बात है की समस्या शादी में है, लड़के मे है या फिर नए सदस्य के जुड़ने में है...... संस्कार भंडार तो सब लेके ही रिस्ता बनाते है फिर ऐसा कौन सा मंत्र छू जाता है कि सब कुछ अचानक बदल जाता है...... हम सभी लोगो को इसपर विचार करने की जरूरत है, यूरोप में child orphan system जो आज भी बहुत तेजी से चल रहा पर child को कोई ना कोई आ ही जाता है गोद ले ही लेता है I अब आइए भारत जो अपने संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है यहा seniors citizens ...

CH-17: LIFE ON TRACK-पटरी का जीवन

LIFE ON TRACK" "पटरी का जीवन" भारत का दुर्भाग्य कहे या किस्मत, ये मेरा खुद का अनुभव रहा है अक्सर लोग कागजों पर आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, शैक्षिक, मानसिक विकास की बात करते थकते नहीं, पर क्या जामिनी स्तर पर इसका कही पूर्ण वजूद दिखता हैं, कुछ दिनो पहले अज़ादपुर, न्यू दिल्ली की झुग्गियों से गुज़र रहा था, झुग्गियों को पार करते रेल की पटरियों से गुज़र रहा था धूप काफी थी, पटरियों के बीच गुज़रते हुए मेरी नज़र पटरियों के किनारे बसी झुग्गियों पर गई, दो पटरीयों के बीच कुछ लोग बैठ कर पत्ते खेल रहे थे, छोटे बच्चे पटरीयों पर बिछे पत्थरों से खेल कर खुश थे, उनका जीवन बहुत ही शालीन था जिसमे सिर्फ तीन चीज़े ही शामिल थी, छत के नाम पर झुग्गि, भोजन और पुराने कपड़े, जो उनकी नज़र से देखा जाए तो बस मज़बूरी मे खुश रहना भी उनकी मज़बूरी ही हैं, अक्सर उनको नीची नज़र से थोड़े अच्छे घरों में रहने वाले देखते हैं, पर बहुतों से मिला हूँ जो झुग्गियों में रहते जरूर है पर दिल बड़े है उनके I उन झुग्गियों में सभी धर्मो के लोग एक साथ मिल कर रहे हुए देखा है, जहां भेद भाव कम दिखता है, हर व...

CH-16: संकल्प

" संकल्प " पि छ्ले लेख मे विकल्पों का कुछ बारीक विवरण दिया गया था, उन्ही मे छिपा एक है छोटा पहलू परंतु पूरे विधि के विधान को बदल सकता है, अगर किसी विकल्प की खोज एक सकारात्मक सोच के साथ की जाए तो वो संकल्प मे परिवर्तित हो जाया करती हैं, ऐसे बहुत ऐतिहासिक उदहारण भरे है जिसकी गिनती की जाए तो एक ग्रंथ की रचना की जा सकती है, संकल्प एक आन्तरिक गतिविधियों का नतीज़ा है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ किसी खास कराणों से ही जन् ‍ म लेता है-एक विचार के रूप में, इसका जन्म बिल्कुल इंसानो की तरह ही होता है, कई करोड़ो गतिविधियों में टकराव के बाद ही एक शक्तिशाली विचार संकल्प बनकर कायाकल्पित होता है, और ये संकल्प का आपके सकारात्मक विकल्पों के कारण ही जन्म लेने को बाध्य होता है. इसका जन्म एक सामाजिक, मजबूत और दूरदर्शी होने का प्रमाण सिद्ध करता है, जो एक बेहतर, विवेकशील इंसान को तैयार करता है, जो कभी मरता नहीं बस जिस् ‍ म का नाश होता है परंतु उसका संकल्प युगों युगों तक प्रेरणा बनकर नए और बेहतर समाज की संरचना करता रहा है और करता भी रहेगा l हम हमेशा से सुनते आए है कमल कीचड़ मे खिलता है ये सार्वभौमिक सत्य ह...

CH-15: बर्फ़ और इंसान

" बर्फ़ और इंसान " ब र्फ़ और इंसान ये दोनों ही समान रूप से व्यवहार करते हैं I बर्फ़ का अतीत भी पानी और भविष्य भी पानी, तो घमंड किसपे करे, बर्फ़ प्राकृतिक या मानवीय करणो से अपना सृजन करती हैं उसका अपना कोई अस्तित् ‍ व नहीं, उसकी ठोस अवस्था किसी के देंन के फलस्वरूप ही आता है, उसकी ठोस अवस्था लंबे समय तक नहीं रह सकती I उसका जल ही जो कि सही रूप है, परिवर्तित होना स्वाभाविक है, ठीक उसी प्रकार इंसान भी है जिसका सृजन कई अवस्थाओं के मेल का नतीज़ा है, इसकी अपनी कोई निजी अवस्था नहीं, इसका सृजन भी खाली हाथ और अंत भी खाली हाथ ही होता है, इसकी अपनी कोई ठोस अवस्था नहीं जिसपे इसे घमंड हो, परन्तु जिस तरह बर्फ़ ठोस है, को अपना सब मान लेता है ठीक उसी प्रकार इंसान भी घमंड मे लिन हो चुका है I जिसकी समझ के लिए कुछ तथ्यों को रख रहा हूँ - सारे समान और विरोधी शब्दों में वर्णों की समानता होती हैं जैसे - (love - Hate /fail - pass /right - wrong /below-high /cry - joy/Life - dead) अन्य बहुत से ऐसे एक दूसरे के विरोधी शब्दो का ढेर है, सोच कर देखे इनमे इतनी समानता है परंतु इंसानो में किसी भी स्तर की समान...

CH-14: एक छुपा सच

" एक छुपा सच " 80:20 के अनुपात को बदलने की जरूरत है, इसका सही रूपांतरण 80:19:1 है, भारत के 80% लोग 20% लोगो को से लड़ रहे अपने हक़ के लिए, पर 80% लोगो की सारी समस्याओं का समाधान तब तक संभव नहीं जब तक 20% के अंदर छुपे 1% लोग जो उनके अंदर चुप कर 19% लोगो को 80% लोगो का विरोधी बना के रखे हुए है, इसे समझने के लिए सही तरीके से इस मैथ्स को समझना होगा. उदाहरण के लिए.... एक clue... 80% लोग कार को देख कर परेशान हो जाते है क्योकि उनके पास नहीं होती है, पर वो कार को टारगेट ना बना के उनके बारे मे सोचे जो helicopter, एरोप्लेन, ships, submarine, और बहुत जादा advanced है, कार वाले तो सिर्फ एक शतरंज के मोहरे है जिनका इस्तेमाल किया जाता है 1% के बचाव के लिए.....ये वो नीति है जो इतिहास से चली आ रही है, तब के लोग समझते थे पर अब के लोग सुनने को तैयार है पर समझना नहीं चाहते अगर कुछ थोड़े बहुत समझ भी गए तो कुछ करने के लायक नहीं बचते क्योकि 1%, 19%की मदद से उनकी आवाज़ को दबा देते है...... दुश्मन कौन ख़ुद ही आकलन करे...... लेखक : Er.RAM SINGH Email:dmsafe01@gmail.com Mob.no :09768836002

CH-13: विकल्प

" विकल्प " आ ज पूरा हिंदुस्तान हर लम्हा सिर्फ विकल्प खोज रहा है, जन्म से मृत्यु तक के सफर में सिर्फ़ और सिर्फ़ विकल्प तलाशता हुआ दिखता है, ये वो अकाट्य सत्य है जिसे कोई चाह कर भी नकार नहीं सकता, है ना बिल्कुल सटीक l नाम से पहचान तक बस इसी जद्दोजहद मे हर कोई लगा है, भौतिकवाद ही परम सत्य हो गया है, इसी भौतिकवाद का सीधा संबंध विकल्प से जुड़ा है, सुई बनाने से लेकर हवाई जहाज तक हर कोई एक दूसरे को मार काट रहा है, कोई तलवार से, कोई छल से, कोई प्रेम से, कोई बम से, कोई हथियार से सिर्फ इसी विकल्प को पाने के लिए. हमारा जन् ‍ म होने से पहले ही ये विकल्प तय कर लिया जाता है अगर लड़का हुआ तो ये होगा और लड़की हुई तो वो होगा, कितना जटिल है जीवन जीना इस तरह के माहौल में, आपके अपने जो दिन रात आपके साथ रहते हैं, व्यक्तिगत से वाणिज्यिक जीवन दोनों मे सिर्फ़ आपनी पहचान एक विकल्प के रूप में ही होती हैं, जहां ऐसा अवसर आया जहाँ से आप किसी के लिए कोई विकल्प सिद्ध ना हुए तो आप उस व्यवस्था से तुरंत बाहर कर दिए जाएँगे और सारे वैकल्पिक लोग मिल करे आपको निष्क्रिय कर देंगे l जब सारा विकल्प बंद हुआ तो आप कुछ ...