बर्फ़ और इंसान ये दोनों ही समान रूप से व्यवहार करते हैं I बर्फ़ का अतीत भी पानी और भविष्य भी पानी, तो घमंड किसपे करे, बर्फ़ प्राकृतिक या मानवीय करणो से अपना सृजन करती हैं उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं, उसकी ठोस अवस्था किसी के देंन के फलस्वरूप ही आता है, उसकी ठोस अवस्था लंबे समय तक नहीं रह सकती I उसका जल ही जो कि सही रूप है, परिवर्तित होना स्वाभाविक है, ठीक उसी प्रकार इंसान भी है जिसका सृजन कई अवस्थाओं के मेल का नतीज़ा है, इसकी अपनी कोई निजी अवस्था नहीं, इसका सृजन भी खाली हाथ और अंत भी खाली हाथ ही होता है, इसकी अपनी कोई ठोस अवस्था नहीं जिसपे इसे घमंड हो, परन्तु जिस तरह बर्फ़ ठोस है, को अपना सब मान लेता है ठीक उसी प्रकार इंसान भी घमंड मे लिन हो चुका है I जिसकी समझ के लिए कुछ तथ्यों को रख रहा हूँ - सारे समान और विरोधी शब्दों में वर्णों की समानता होती हैं
जैसे - (love - Hate /fail - pass /right - wrong /below-high /cry - joy/Life - dead)
अन्य बहुत से ऐसे एक दूसरे के विरोधी शब्दो का ढेर है, सोच कर देखे इनमे इतनी समानता है परंतु इंसानो में किसी भी स्तर की समानता नहीं पाई जाती, हम इंसान समान चीज़ खाते /पीते /पहनते /घूमते /और ना जाने क्या-क्या सब एक जैसा ही करते है, परंतु विचारों में कितना व्यभिचार दिखता है I कितनी हीन भावना को लेकर इस दुनिया में जीते है और खुद को सामाजिक प्राणी कहने में जरा भी नहीं हिचकिचाते है हम, क्या हम सच में ऐसे होते है जैसा हम बोलते है? क्या हम दोहरी जीवन शैली के बिना जी सकते हैं? क्या हम खुद को कम मे रख कर दूसरों को थोड़ा ज़्यादा दे सकने में सक्षम हैं?
आदमी और इंसान में क्या हम फ़र्क करना जानते है ? खुद से ये सवाल करे दर्पण के सामने खड़े होके शायद जवाब मिल ही जाये I
Note:- अन्य तक भी इसका प्रेषण ज़रूर करे अगर कुछ सवाल ज़ेहन में उठे हो तो..... I
धन्यवाद
लेखक:
Er. RAM SINGH
DELHI-INDIA

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