हम हिंदुस्तान के 95% आबादी हमेशा अधूरा ही काम करते आए है, जिसे हम कई स्तर पर देख सकते हैं, उदहारण के तौर पर : modernization को घोल कर पी तो गए है पिछले दो दशकों में पर हज़म आज तक नहीं कर सके है और शायद कभी कर भी नहीं सकते, क्योंकि हमारा स्वभाव कौए जैसी जो बन गई हैं, हम सिर्फ़ बोलने में और किसी की ना सुनने और समझने में ही भरोसा करते आए हैं, हम शारीरिक मॉडर्न तो बन गए परंतु मानसिक तौर पर आज भी चिंन्दी चोर ही बने हुए है, हम पश्चात संस्कृति की कुछ नकल करके खुद को मॉडर्न समझने की भूल कर बैठते है, हम आज भी कपड़ो, गाड़ी, घर, या अन्य भौतिक चीज़ों को बाखूबी खुद मे आत्मसात कर चुके हो पर पश्चात संस्कृति की सोच विकसित नहीं कर पाए है, अन्य विकशित देश जात, धर्म, भेद, ऊंच नीच से बहुत परे हो चुके हैं, और उनकी कामयाबी का सबसे बड़ा राज़ भी यही है, हम अंग्रेज़ी तो बोलते जरूर है पर खुद को civilized साबित करने के लिए पर क्या उनके देश में ऐसा होता है मेरे हिसाब से तो नहीं, तो बताए कहा से मॉडर्न हुए हुए हम, वो हमे कॉपी कभी नहीं करते अगर करते भी होंगे तो बस यहा कि पारम्परिक और ऐतिहासिक चीज़ों को कुछ समय के लिए, और हम हिंदुस्तान के होकर भी पूर्ण रूप से हिंदुस्तानी नहीं है, क्या हम उनके जैसे विकसित कार्य को करते है, इसे भी उदाहरण से समझते है,वो अगर कोई Business strategy बनाते है तो वो successful हो जाते हैं और ठीक उसी तरह की business strategy हम copy करके इंडिया मे लांच करते है और कुछ सालों में सुनने मे आता है कि कंपनी फ़ेल हो गई या भाग गई ऐसा क्यो होता है इसको हम कभी नहीं सोचते, बस ये फितूर रहता है उसने किया तो हम भी करेंगे, कॉपी हमेसा कॉपी ही होगी original हमेशा original ही रहेगा, मै किसी की वकालत नहीं कर रहा जो सच लगा उसे बयान कर रहा हू,
भारत मे जितनी भी पॉलिसी बनायी जाती है वो गायब हो जाती हैं क्योकि हम सब लालची प्रवृति के मानव बन गए, हम एक के साथ एक free वाले attitude के इंसान बन चुके हैं, अगर ऐसा नहीं है तो इतनी वियमैनस्य व्याभीचर देश और हम सबके मन में क्यो है?
हम हमेशा डर के साये में जीने को मज़बूर है उसपर भी खुद पर इनता गुमान किस लिए, हम हमेशा से हां-हुज़ूरी ही करने को क्यो मजबूर हैं, जब तक इस गुलामी से खुद को अज़ाद नहीं करेंगे यकीन मानिए कभी सुकून के दो पल हासिल नहीं कर सकते हैं, मेरा अपना खुद का ये अनुभव रहा हैं चपरासी से अधिकारी तक चोर बैठे हैं कुण्डली मार कर और इन सबके बीच मध्यमवर्गीय समाज घुन की तरह पीसने को मजबूर हैं, अब इसका उपचार क्या हैं सवाल ये है, तो जवाब भी सीधा सा है इन्सानियत जो हिंदुस्तान के लोगो में दम तोड़ चुकी है उसे पुनः ज़िंदा करने पर ही समस्या का समाधान हो सकता हैं l
हिंदुस्तानी दिमाग अवसरवादी बन गया है, जरूरत है इसे बदलने की, जो इंसानी दिमाग अवसरवादी बन गया है उसे सकारात्मक एवं संभावनात्मक दिशा की और मोड़ कर ही स्व-समावेशी बनाया जा सकता हैं l
आप सभी पाठकगणो से विशेष अनुरोध है कि इसे पढ़े और अन्य लोगो तक इसे पहुंचए अन्यथा देश के हालात तब तक नहीं सुधर सकते जब तक हम निज़ी स्तर पर सुधार करने को तैयार नहीं होंगे l
धन्यवाद आप सभी का
लेखक :-
Er.Ram Singh
Mob.no : 09768836002

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