"जीवन का नैतिक मूल्य इसमें ही है कि रोजगार के मोर्चे पर सरकार के नाकाम रहने पर सवाल पूछा जाए"
20 नवंबर को राजस्थान के अलवर में ट्रेन के आगे छलांग लगाकर तीन नौजवानों का खुदकुशी करना हाल में भारत में हुई ऐसे मौतों की एक भयावह कड़ी है. नैतिकता के लिहाज से देखें तो भारत के लोगों को मौत के विचार को नए सिरे से देखना होगा. इस पर विचार करना होगा कि लंबा जीवन जरूरी है या फिर किसी अच्छे मकसद से कम समय का जीवन ज्यादा अच्छा है. किसी की जिंदगी को तब ही मकसद मिलता है जब वह अपने काम को रचनात्मक दायरे में ले जाए. इसके लिए अनुकूल अवसरों की जरूरत होती है. ताकि सही ढंग से मानसिक और शारीरिक क्षमताओं का विकास हो सके. इससे अपनी अहमियत समझने की क्षमता विकसित होती है. यह क्षमता तब बेहद कम हो जाती है जब व्यक्ति मुश्किल परिस्थितियों से घिर जाए. युवाओं को इस समस्या का सामना अधिक करना पड़ रहा है. क्योंकि उनकी आकांक्षाएं अधिक होती हैं. उच्च शिक्षा में दाखिला बढ़ते जा रहा है और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं को ही भविष्य सुरक्षित करने का एकमात्र माध्यम माना जा रहा है. इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि स्थितियां कितनी खराब हैं.
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का संकट गंभीर हो गया है. क्योंकि एक अवधारणा के तौर पर प्रतिस्पर्धी परीक्षाएं व्यावहारिक तौर पर अपनी सीमा तक पहुंच गए हैं. जिन तीन युवाओं ने आत्महत्या की, वे तीनों सिविल सेवा में जाना चाहते थे. अपनी शैक्षणिक योग्यताओं और परीक्षा के लिए की जा रही ईमानदार कोशिश की वजह से उन्हें लगता था कि उन्हें एक स्थायी सरकारी नौकरी मिलनी चाहिए. लेकिन उन्हें अपने मूल्यांकन में यह लगने लगा कि अब उन्हें नौकरी नहीं मिलने वाली. इनके दोस्तों के बयानों से यह पता चलता है कि इन्हें लगने लगा था कि ये अपने परिवार के लिए बोझ बन गए हैं. अपनी अहमियत समझने की इनकी समझ खो गई थी. बड़ी संख्या में देश के युवा इस स्थिति में खुद को पा रहे हैं. पिछले कुछ साल में कई युवाओं की मौतों से इसका पता चलता है.
हालांकि, राजनीतिक लोग राष्ट्रवादी विमर्श के जरिए युवाओं के नैतिक मूल्यों को बढ़ाने की बात करते हैं. ये लोग भारतीय युवाओं को विकास को आगे बढ़ाने वाले धरोहर और राष्ट्रीय गर्व के तौर पर पेश करते हैं. ये नेता और मौजूदा सरकार मेक इन इंडिया अभियान में युवा शक्ति की भूमिका का बखान करते दिखती है. इस विमर्श में जान दे रहे युवाओं के प्रति सहानुभूति नहीं है. सत्ताधारी वर्ग की उदासीनता का अंदाज इस बात से भी लगता है कि इनके नेता इन मौतों पर कुछ बोलने की जरूरत भी नहीं समझते. न तो बाजार और न ही सरकार इन युवाओं को जीवन यापन का बेहतर माध्यम मुहैया करा पा रहे हैं. सम्मानजनक रोजगार के अवसर अभाव में पहले इन युवाओं को सामाजिक मौत मिलती है और बाद में शारीरिक.
भारत के संदर्भ में सामाजिक मौतों पर जाति आधारित सिविल सोसाइटी के रुख में इस बात में भेद नहीं दिखता कि खतरनाक नालियों को साफ करने वाले लोग मर क्यों रहे हैं और उन्हें यह काम करने के लिए बाध्य क्यों होना पड़ रहा है. किसान और बेरोजगार युवाओं को शारीरिक मौत का रास्ता लाचारी में उठाना पड़ रहा है. क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी कोई अहमियत ही नहीं बची. युवाओं के अस्तित्व को आज पुलिस जांच,फोरेंसिक जांच और मुआवजे के जरिए ही समझा जा रहा है.
विडंबना यह है कि सरकार कई बार खुद इन युवाओं को कई बेवजह के मुद्दे उठाकर इस विकट परिस्थिति में डाल रही है. सत्ताधारी पार्टी और उनके नेताओं में यह नैतिक साहस नहीं है कि वे यह कह सकें कि उनकी सरकार रोजगार मुहैया कराने में नाकाम रही है. इनकी राजनीति इन्हें इस बात की इजाजत नहीं देती कि ये यह सच बयां कर सकें कि कौशल विकास से संबंधित कार्यक्रम और रोजगार मेला नाकाम रहे हैं. इन सबने नौकरियों को लेकर एक भ्रम पैदा करने का काम किया है. ऐसी स्थिति में भारतीय युवाओं के पास यह नैतिक प्रतिबद्धता है कि वह सत्ताधारी पार्टी को यह कह सके कि सरकार बेरोजगारी की मूल समस्या को सुलझाने में नाकाम रही है. लेकिन सत्ता को सच कहने का माध्यम दर्दनाक नहीं होना चाहिए. यह बदलाव लाने वाला होना चाहिए. धार्मिक आधार पर युवाओं को भटकाने का एजेंडा राजनीतिक दलों के पास है लेकिन क्या यह युवाओं की जिम्मेदारी है कि वे ज्यादा सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन से जुड़े सवाल आगे बढ़कर उठा सकें?
Er. Ram Singh
Delhi

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