भारत का दुर्भाग्य कहे या किस्मत, ये मेरा खुद का अनुभव रहा है अक्सर लोग कागजों पर आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, शैक्षिक, मानसिक विकास की बात करते थकते नहीं, पर क्या जामिनी स्तर पर इसका कही पूर्ण वजूद दिखता हैं, कुछ दिनो पहले अज़ादपुर, न्यू दिल्ली की झुग्गियों से गुज़र रहा था, झुग्गियों को पार करते रेल की पटरियों से गुज़र रहा था धूप काफी थी, पटरियों के बीच गुज़रते हुए मेरी नज़र पटरियों के किनारे बसी झुग्गियों पर गई, दो पटरीयों के बीच कुछ लोग बैठ कर पत्ते खेल रहे थे, छोटे बच्चे पटरीयों पर बिछे पत्थरों से खेल कर खुश थे, उनका जीवन बहुत ही शालीन था जिसमे सिर्फ तीन चीज़े ही शामिल थी, छत के नाम पर झुग्गि, भोजन और पुराने कपड़े, जो उनकी नज़र से देखा जाए तो बस मज़बूरी मे खुश रहना भी उनकी मज़बूरी ही हैं, अक्सर उनको नीची नज़र से थोड़े अच्छे घरों में रहने वाले देखते हैं, पर बहुतों से मिला हूँ जो झुग्गियों में रहते जरूर है पर दिल बड़े है उनके I
उन झुग्गियों में सभी धर्मो के लोग एक साथ मिल कर रहे हुए देखा है, जहां भेद भाव कम दिखता है, हर व्यवस्था में लगभग काफी समानता भी नज़र आती हैं, मेरा मन बस उनको समझने में उलझा हुआ था और कई बार मेरे पैर लड़ख़ड़ा गए, परंतु मेरी नज़र उन झुग्गियों से हटी नहीं, उनको देखाता हुआ अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ा जा रहा था, 45 मिनट में 45 हज़ार सवाल चल रहे थे, क्या इनको आम जीवन का हक़ क्यो नही मिला ? , इन लोगो से जन्मी पीढ़ी किस ओर जाएगी ? बस यही प्रबल विचार मुझे परेशान करता जा रहा था, मन में विचार आये कि इनको भी वो सब अच्छा तो जरूर लगता होगा जो एक इन्सान को जीने के लिए चाहिए l देश का समुचा विकास करने वाले मठाधीश को ये सब नज़र तो आता ही होगा l हर चीज़ के दो पहलू होते हैं, दिल्ली भारत की राजधानी तो जरूर है परंतु यहा सबसे ज्यादा सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीति, फासले मौज़ूद है जिसे नकारा नहीं जा सकता, बहुत अमीरी और जरूरत से ज्यादा गरीबी दिल्ली मे देखने को मिली हैं,
मै क्या कर सकता हूँ इनके लिए तो जवाब मिला कुछ नहीं, फिर भी सोचा कुछ करू ना करू इनको सोशल मीडिया के ज़िरिए इनकी व्यथा को उजागर करू शायद कोई इनके लिए हाथ बढ़ाये, समस्या तो दुनिया की हर आखों को नज़र आता है परंतु समाधान चंद आखों को दिखता रहा है हर अनादिकाल में, ऐसा क्यो होता है, हर चीज़ मे समानता की बात करते हैं पर जहां समाधान की बात होती हैं लोगों को दिखना क्यो बंद हो जाता है l मेरी आखों को हमेशा समाधान नज़र आता रहा है पर उसे वाकई में पूरी तरह से अग्रेषित नहीं कर नहीं पा रहा हू इसके पीछे हज़ारों बाह्य कारण मुझे बांधे हुए हैं !
और दूसरी तरफ भी ये वाक्य बिल्कुल सत्य है जो बनना चाहेगा वही बन पाएगा उसे कोई बना नहीं सका, झुग्गियों में पटरीयों किनारे बसने वालों की कि सोच रूढ़िवादी भी बन गई हैं कि बस यही मेरा लक्ष्य है और मै इससे ज्यादा कुछ कर नहीं सकता, जब ये मानसिकता जीवित रहेगी झुग्गियों कभी मकानो में बदल नहीं सकती! झुग्गियों में बसानेवॉलों का खुद और अपने परिवार के बहुत कम ज़िम्मेदारी लेते हैं, मौके तो उनको भी जरूर मिले होंगे पर उनको समझें ना होंगे l
अमीरी - गरीबी मे कुछ बहुत खास लक्षण है जो आपका स्थान तय करते हैं :-
अमीरी के लक्षण :
1: सोच अमीरों जैसी
2: सही रास्ते का चुनाव
3: सही लोगो का साथ
4: दूरदर्शी विचारधारा
5: खुद पर सबसे ज्यादा काम करना
6: चुनौती को स्वीकारना
7: परिश्रमी होना
8: काम का मसौदा तैयार करना
9: अच्छा नेटवर्क बनाना /नेटवर्क को पक्का करना
10: विवादों से खुद को बचा के रखना
11: शालिन /शांत होना
12: टार्गेट decide करना
गरीबी के लक्षण :
1: सोच गरीबों जैसी
2: कुछ भी चुन लेना बिना विचार किए
3: बुरे लोगो का साथ
4: निम्नदर्शी विचारधारा
5: सबसे कम खुद पर काम करना
6: चुनौतीओं से भागना
7: मेहनती होना
8: बिना मसौदे के काम करना
9: नेटवर्क सबसे खराब रखना
10: हमेशा विवादस्पदो से घिरे रहना
11: उग्र स्वभाव का होना
12: कोई टार्गेट नहीं
ये कुछ अन्तर है जो मुझे नज़र आए और भी बहुत कारण है परंतु सबको एकसाथ लिख पाना नामुमकिन नहीं पर शार से पूरी कहानी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है, जिस दिन अमीरी और गरीब खाई कम होने लगेगी बहुत सारी दिक्कतें खतम होने लगेगी पर कई दशकों मे देखा गया है ये फासले कम होने बज़ाय बहुत ज्यादा बढ़ गए हैं!
ये वो भारत है जिसे हर भारतवासी जनता तो है पर समझने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं.
पाठकगणो से आग्रह है इसे शेयर और कमेंट जरूर करे
Written By:
Er.Ram Singh Delhi-India

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