कष्ट क्या है ? (मेरे जीवन की दास्तान से निकले कुछ पन्ने.. )
जिस दिन इस दुनिया में कोई जन्म लेते है ये कष्ट उसी दिन दस्तक देता है , जीवन में बस इस बात का एहसास 20 से 25 तक आते आते होने लगता है I
मैंने भी इसी कष्ट को बड़ी ही बारीकी से महसूस किया है आज उसी के कुछ छिपे हुए पह्लुओं को विस्तारित कर रहा हूँ शायद यही समानता किसी और के साथ भी हो सकती है I
मेरा जन्म जिला-आजमगढ़, गाँव-कंजहित ,उत्तरप्रदेश के एक छोटे से गाँव में हुआ है I मेरा जन्म शायद पुरे गाँव में ख़ुशी के लहर लेकर आया होगा पुरे परिवार का सबसे बड़ा वारिस हूँ, मुझसे नयी पीढ़ी की सुरुवात हुई I मेर पिता अपने गाँव के सबसे पहले सरकारी मास्टर केन्द्रीय विद्यालय में हुए जिनकी पहली पोस्टिंग कोलकत्ता के हल्दिया टाउनशिप में हुई I बहुत सपने देखे होंगे उन्होंने मुझे लेकर और वाकई में ये बात सही थी I मै भी कभी गाँव के प्राइमरी स्कूल में दस्तक नहीं दी बस शहर में पापा के साथ रहना और पढना ही अपना लक्ष्य था I शायद मुझे याद है एक दिन प्राइमरी स्कूल में गया था वो दिन पहला और आखरी दिन था, उसके बाद जीवन में कभी प्राइमरी स्कूल में कदम नहीं रखा I 3 साल का था अपने नन्हे पाओं के सहारे पहुँच गया कोलकत्ता शहर पापा के साथ I कुछ दिनों तक पापा ने english में ABC सिखाया और करा दिया मेरा दाखिला केन्द्रीय विद्यालय में ट्रायल बेसिस पर !
वो बचपन का समय,हल्दिया टाउनशिप , हुगली (गंगा नदी को हुगली बोला जाता है पश्चिम बंगाल मे ) नदी के किनारे स्कूल था , रोज़ पापा के साथ पैदल उंगली पकड़ कर स्कूल तक का सफ़र तय करना और थक जाने पर पापा रुक जाना आगे न चलने की जिद करना तो पापा गोद में उठा कर पैदल स्कूल तक ले जाते रहे I अन्य शहरी बच्चो के साथ बहुत जल्दी घुल मिल गया और धीरे-धीरे शहरी माहौल में ढलने लगा , बड़ा ही शानदार और रोमांचित करने वाला पल था I मेरा एक दोस्त बना जिसके साथ अपना टिफ़िन बॉक्स शेयर करना मुझे अच्छा लगता था I मुझे कुछ आता नहीं था फिर भी मैडम मुझे सबसे आगे बैठा दिया करती थी पेंसिल तक ठीक से नहीं पकड़ना आता था, कुछ महीने में पेंसिल पकड़ कर लिखना सिख गया उस समय LKG-UKG जैसा कोई कांसेप्ट नहीं हुआ करता था उम्र में काफी छोटा था उम्र बढ़ा करा एडमिशन हो गया था स्पेशल techers quota में I प्रिंसिपल ने पापा से कहा बहुत छोटा है पढ़ नहीं पाएगा पर पापा ने पुरे कॉन्फिडेंस के साथ कहा यदि ३ months में नहीं कुछ सिखा तो next year नाम लिखवा दूंगा पर इसे ट्रायल दिया जाये, फिर क्या था हुआ मेरा ट्रायल एडमिशन पहला टेस्ट हुआ नंबर भी अच्छे आ गए सभी सब्जेक्ट्स में प्रिंसिपल ने दे दिया कम्एपलीट डमिशन और बोला इतना छोटा और इतना प्रभावी जबकि कभी उससे पहले बुक्स को हाथ तक नहीं लगाया था I
समय बित रहा था पापा और मैं अकेले ही रहते थे, मै हर जगह पापा के साथ जाता था मुझे सँभालने के लिए कोई नहीं था इस लिए पापा का पूरा ध्यान मुझपर ही रहता था मम्मी गाँव में रहती थी दादा-दादी के साथ I कुछ समय बाद नया स्कूल बना बहुत ही शानदार बिल्डिंग जहा पूरा स्कूल शिफ्ट हो गया वो भी नहर के किनारे था I देखते-देखते तीसरी क्लास में आ गया दोस्त वही सब थे, उनमे से दो नयी दोस्त बनी जो बहुत ही अच्छी थी जिनके साथ अक्सर खेलता था कृति और स्वदिका और बाकि समीम, उत्पल मेरे पुराने दोस्त हम पुरे पांच दोस्त थे, जो हमेशा अपनी टिफिन शेयर करते थे और छुट्टी होने से पहले ये तय हो जाता था की कौन क्या बनवा कर लाएगा सबकी मम्मी साथ थी, पर मेरे साथ सिर्फ पापा ही थे जिससे मुझे छुट थी मै कुछ भी लेकर जा सकता था I साथ बड़े हुए फिर पांचवी में एक और दोस्त बनी जिसका नाम सनेहा था प्रिंसिपल सर की बेटी वो पढने में सबसे तेज थी और english भी बहुत अच्छी थी, अपना हाथ english में टाइट था I english का सारा होमवर्क वही करती थी उसके बदले अपना लंच और हर होम्वोर्क पर एक kissmi bar choclate देना पड़ता था फिर दोस्ती का हवाला देकर उसी में से अपना भी कम चल जाता था I क्लास 6 खत्म होने से पहले ही पापा का tarnsfer शक्तिनगर ,सोनभद्र जिला उत्तरप्रदेश में हो गया I उस समय तक मेरी छोटी बहन और भाई आ चुके थे I
दोस्तों से रोते हुए विदा हुए सबने मुझे वही पूरानी फेवरेट kissmi bar गिफ्ट दिया, हम सब फिर नये सफ़र पर चल पड़े पर इस सफ़र में मै ,मम्मी ,पापा एक भाई और बहन शामिल थे हम पुरे पाँच लोग थे I
पहले से काफ़ी समझदर और पढने में तेज भी हो गया था english में काफी कण्ट्रोल भी हो गया था अपना होम खुद करना भी सिख गया था english के case में I शक्तिनगर केन्द्रीय विद्यालय में 6th B में एडमिशन हो गया बहुत ही आसानी से बिना किसी प्रॉब्लम के अर्धवार्षिक परीक्षा देकर आया था हल्दिया में ही I तो बस यहाँ year एग्जाम ही देना था I पर शक्तिनगर में एक बड़ी समस्या थी मुझे गाली देना नहीं आता था यहाँ सरे लड़के गाली ही दिया करते थे ये माहौल बहुत ही unacceptable था मेरे लिए साले का मतलब भी नहीं मालूम था, स्कूल से हमेशा सुन कर आता था और पूछता था पापा से तो पिटाई अलग से होती थी, मै बड़ा परेशान की क्या किया जाये ? गाली कोई और दे और मतलब पूछने पर पिटाई मेरी होती थी, तो एक आईडिया आया रहने देता हूँ इसका नोट बना लेता हूँ फिर कभी किसी से पुछुगा ऐसा इस लिय था क्योकि कुछ अलग होता था तो जानने की इच्छा बहुत होती थी ये गाली बहुत ही नया और विचित्र था मेरे लिए I धीरे धीरे इसी माहौल में ढलने लगा उल्टा-सीधा सिखने लगा और पढाई भी जम के करता था I 10 th तक लगभग हर फिल्ड में मास्टर हो गया था I स्कूल में अपने senior student को देखता था हर कोई couple के साथ दीखता था, तो मुझे भी अच्छा लगा मेरा भी मन हुआ की मुझे भी try करना चाहिए पहले बार try किया तो धुलाई हो गई फिर मुझे समझ आया की ये तो बड़ी ही tension वाली जॉब है और risk पिटाई का अलग से I तो इससे बचा कैसे जाये तो बहुत रिसर्च करने के बाद पता चला की so-called स्कूल लेवल पर चीन्दी माफिया होते है, तो कर ली उनसे दोस्ती पर इस बात का ख्याल रखा की पढाई पर कोई असर न आये I स्कूल माफिया से दोस्ती एक अलग ही chapter था जहाँ से life में U-Turn शुरू हुआ I
कुछ बदमाश दोस्त बनाये और उनको सारी बात बताई की मेरी धुलाई ऐसे हुई है, उन सबने कहा तेरा बदला लिया जायेगा मुझे उकसाया की on-the spot स्पॉट स्कूल गेट पर मुझे पहले मरना है वो भी बिना डरे और दिक्कत ये थी की उसी स्कूल में पापा teacher भी थे तो डर बहुत था पर दोस्ती और बदले का जूनून सवार था बिना सोचे समझे ये एक गलत कदम उठाना किस हद तक विनाशकारी हो सकता था इसका अंदाज़ा बिलकुल भी नहीं था I जिसको पीटना था उसकी history का कोई अंदाज़ा नहीं था I आखिर वो दिन भी आ गया स्कूल के गेट के बहार ही निशांत (पीटने वाला लकड़ा) मिल गया दो तिन दोस्तों की मदद से उसीकी जम के पिटाई तो कर दी, पूरा स्कूल स्तब्ध रह गया पुरे campus में दिन दहाड़े बिना डरे एकदम फ़िल्मी अंदाज़ में लहू-लुहान कर दिया I इस दृश्य को देख कर एक पढने वाले student की छवि मिट सी गई एक पल में ही , जिसकी पिटाई की वो वह के लोकल माफिया का भतीजा था इस बात पता बिलकुल भी नहीं था I यहाँ स्कूल में भी suspend का order ready हो गया था मुसीबत गले पड़ गयी पापा की पप्रतिष्ठा का सवाल आ गया दूसरी तरफ उस माफिया का भी दबाब बनने की आशंका परेशान कर रही थी ,अब पढाई पर असर दिखने लगा लगा फिर भी खुद को संभाला I
लोकल माफिया स्कूल के चक्कर लगाने लगे मेरी तलाश में , डर नहीं था बस रास्ता बदल न जाये यही सोच रहा था , काफी गस्त लगाने के बाद मुझे वहां ले लोकल गुंडों ने ढूंड लिया और ले गेये पकड़ कर अब डर भी था की मार कर फेक न दे, पर डरा नहीं ये सोच कर की जो होगा अब देख लूँगा और जितने स्कूल के दोस्त से सब भाग खड़े हुए I निशांत के चाचा के यहाँ पेशी हुई उसने बात की, पूरा मामला बताया फिर उसने न जाने क्या सोच कर डरा कर छोड़ दिया I पर उसकी कुछ बात चुभ गयी I मै वह से निकल आया अब उसकी बात बार-बार मुझे tension दे रही थी दुसरी तरफ पापा का गुस्सा अलग ही चल रहा था I सात दिनों तक स्कूल में जाने की परमिशन नहीं थी, पर इन्ही सात दिनों में उस माफिया की बात घुमती रही अब उसको सबक सिखाने की ठान ली बस फिर क्या था उसके दुश्मनो को खोजने में लग गया आखिर मिल ही गया उसका दुश्मन उनके साथ हाथ मिला लिया अच्छी रणनीति और और हिम्मत के दम पर धुल चटा ही दी, पर पढाई पर अब बुरा असर आ गया था I सोचा बदला तो पूरा हो गया पढाई में लग जाऊ पर किस्मत में क्या दस्तक देगी इसका अंदाज़ा नहीं था ....
एक नया और चौथा अध्याय शुरू हुआ.......???
by: राम सिंह, दिल्ली , भारत

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