जिस मानसिक कलह से गुजारता हूँ मै रोज, पिछले कई सालो से आज वो पूर्ण रूप से मानसिक नासूर बन गया है, जैसे-जैसे मन में किसी अपने के प्रति इज़्ज़त का भाव घटने लगता है तो समझ लो उसकी मौजूदगी चंद दिनो की ही रहेगी I आपके जीवन मे, यूँ तो देखा जाए आप कातिल खुद ही है अपनों के, पर उसका कोई सबुत नहीं, नहीं कोई गवाह होता है, कत्ल करने वाला खुद को बदकिस्मत कहता है पर असल मे गुनहगार वो खुद होता है, मेरा भी कत्ल कई बार हुआ, बस जलाना और दफनाना ही शेष रह गया, ये तो बिलकुल सच है जो दिखता है वो ही बिकता है, आर्थिक अभाव ने झूठा, बदकिस्मत, बेकार, भीखारी, धोखेबाज़, नालायक, गिरा हुआ हुआ और ना जाने किन-किन नामों से नवाजा जाता रहा हूँ मैं, दो ही रास्ते बचते है या तो हार मान लू या परिस्थितियों का सामना करू, हारु या जीतू दोनों ही हालत मे मरना मुझे ही होगा, ये तो अपनी-अपनी समझ हैं, पर मुझे अफसोस नहीं है मेरा ये हाल है मुझे तो अफसोस इस बात है कि मेरे ना होने के बाद तेरा क्या हाल होगा, हो सके मेरे ना होने के बाद सब कुछ तेरे नसीब मे होगा पर क्या तुम सच में मुझे भूला पाओगे, कम से तेरे मरने से पहले तो तेरी आँखों मे एक बार आंसू बनकर टपक तो जाऊंगा ही, इतनी तो शायद मोहब्बत तुने मुझसे की ही होगी, कम से कम एक बार जब मिला होऊंगा, इतना तो यकीन मुझे है ही कम से कम.... आज भले ही सितारे गर्दिश मे है पर कम से कम तेरी नज़र मे तो हैं, तो आखों का नूर समझ के रख ले वर्ना चमक गए तो तेरी आखों को नज़र भी ना आयेंगे, ये खुद से वादा है मेरा मरने से पहले तेरी आखों से ओझल तो हो जाऊंगा, ना तेरी आखों का नूर सही किसी अपने को सुकून की वज़ह तो बन जाऊंगा मरने से पहले.... ये वो आखिरी संदेश था जो मैं अपनों को देना चाहता था......
एक राहगीर
लेखक :
राम सिंह , दिल्ली

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