एक समय था जब लोगो के पास डिजिटल ग्रुप सिस्टम नहीं था फिर भी कोसो मील दूर रह कर भी लोग एक दूसरे के लिए तत्पर रहा करते थे और बिना किसी स्वार्थ के और आज का तो ये बुरा हाल है कि ग्रुप में टाइम पास करना एक कल्चर सा बन गया है, किसी बकवास मुद्दे पर उल्टे सीधे कमेंट तक ही लोगो का दिमाग चोक हो चुका है, ऐसी मानसिक गुलामी से शिकार बन चुके हैं जिससे उबर पाना नामुमकिन ही है अब तो, पहले लोगो का रिश्ता इस बुनियाद पर हुआ करता था कि मै किसी के सुख मे रहू ना रहू पर यदि दुःख मे साथ खड़ा होने का अवसर मिले तो जीवन मे कुछ सन्तोषजनक किया ऐसा खुद को महसूस हो, पर आज के दौर में रिश्ता उसी दिन से कमजोर होने लगता है जिस दिन आपके सहयोगी ने आपसे कुछ सहयोग मांग लिया फिर क्या तुरंत जी चुराना, कन्नी काटने का प्रचालन सुरू होने लगता है, अक्सर सुना होगा ये कहते लोगो से की मै तुम्हारे साथ हमेशा खड़ा हूँ परंतु जब आप कभी गलती से साथ मांग भर ले तो आपको खुद ही मालूम है क्या जवाब आएगा उसे बताने की जरूरत नहीं I
अब क्या हम वाकई में सच्चे इंसान या दोस्त होने का दावा करते हैं, वो कितने हद तक सार्थक दावेदारी सिद्ध करता है? क्या इसका आकलन करने की जरूरत नहीं है? क्या ये मानसिक गुलामी और आर्थिक गुलामी ही जीवन के सही मार्गदर्शन को दर्शाता है? क्या उगते हुए सूरज को सलामी और डूबते को तिरस्कार क्या यही सत्य है, सोशल मीडिया को literate और educated हर तरह के लोग इसका पूर्ण इस्तेमाल करता है, क्या शिक्षा हमे आर्थिक गुलामी करना शिखाती हैं और सामाजिक खाई को बढ़ाती हैं?
उप्परोक्त मुद्दे सवाल से दिखते है पर ये खुद के संस्कार पर प्रश्न चिन्ह लगाता है, इसपर विचार तो बनता ही है.
ये मेरे कुछ के अनुभव प्राप्त विचार है किसी से इसकी समानता हो भी सकती है और नहीं भी, किसी को आघात हेतु बिल्कुल भी नहीं हैं, इसपर आप सब अपने विचारों को रखने के लिए स्वछंद है I
लेखक :-
Er. Ram Singh (president)
dmsafe01@gmail.com
Delhi

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