क्यों डरा है देश का बहुत बड़ा हिस्सा जो सदियों से पीड़ित, डरा हुआ और सहमा हुआ है आखिर ऐसा क्यों है ? इस बात को समझना बहुत ही जरुरी है , देश का बहुत बड़ा हिस्सा मध्यम वर्गीय है ,इनके डर का सबसे बड़ा कारण है इनका समाज का हिस्सा होते हुए भी अकेला होना ,सिर्फ बातो में संयुक्त रूप से नज़र आते है पर जिमिनी स्तर पर ये बिलकुल अकेला और तनहा होता है I ऐसा तबका जो आतंरिक रूप से अकेला होने के साथ-साथ पारिवारिक रूप से भी सहयोग नहीं प्राप्त कर पता I ऐसा कोई स्तर नहीं है जहाँ ये डरता न हो और हो भी क्यों ना इनके पीछे कोई इनको सँभालने वाला भी तो नहीं होता, बस गिरने का जो डर है पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है जो सिलसिला थमने का नाम तक नहीं लेता I इन हजारों लोगो में गलती से मुट्ठी भर हिम्मत दिखाता भी है तो किसी न किसी रूप में दबा दिया जाता है जो बिलकुल परंपरागत व्यवस्था है I
पैदा होने से मरने तक का हर डर उनको ना चैन से जीने देता है और ना ही मरने देता है I ये तबका आखिर करे भी तो क्या करे, इनकी ज़िन्दगी हमेशा किसी न किसी के आधीन ही रहती है, और तो और इन लोगो की ऐसी मानसिकता भी विकशित हो जाती है की हम कुछ कर नहीं सकते और यही इनकी किस्मत भी है- ऐसा मान कर खुद को समझा भी लेते है ,ऐसा लगता है ये वो जिंदा लाशें है जो चल तो रही है पर इनकी कोई सूझ बुझ नहीं है I
बचपन से किताबों में, फिल्मो में, नाटको में, आदि मे देखते-पढ़ते आये हैं की नैतिकशास्त्र हमेशा मजबूत होना चाहिय I उसी को अगर मजबूत करने निकलो तो हजारों अटकलें सामने आकर खाड़ी हो जाती है I कुछ इसे पार कर जाते है पर अधिकतर धराशाही हो जाते हैं I मुद्दा यही है की मनोबल का औसत इंतना कम क्यों है ? इसी मनोबल के स्तर को बढ़ाना ही आपको मज़बूती दे सकता है , हजारों सालों से औसत देखा जाये तो मनोबल मात्र 5 प्रतिशत तक ही बढ़ा है तभी तो 95 प्रतिशत भारत की आबादी 5 प्रतिशत आय में उलझी है और 5 प्रतिशत लोग 95 प्रतिशत आय का पूर्ण लाभ उठा रहे है I इतनी बड़ी खाई जो लगातार बढ़ ही रही है और हम सब कहते है देश आगे बढ़ रहा है ,सच्चाई ये है की पूरी आबादी का मात्र 5 प्रतिशत ही बढ़ रहा है और बाकि रेंग रहा है कई दशकों से I
बड़ी आबादी का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा ऐसे हालत में डरा- शहमा हुआ नहीं होगा तो क्या होगा होगा ? विकास देश ने किया है ये बिकुल सच है पर क्या देश के लोगो ने सही मायाने में विकास किया है सवाल ये है ?
इस तरह की परिस्थिति के ज़िम्मेदार भी हम स्वयं है, कुछ नहीं होने से कुछ तो अच्छा है वाली मानसिक परिस्थिति हमेशा इनको पंगु बना कर रख देती है और हमें पंगु बनने की आदत कई पीढ़ियों से पड़ गई है I जिस दिन इस तबके की आँख खलेगी ये एक क्रांति दोबारा जरुर लाएगा, खुद के बेसिक नीड को पूरा करने के लिए और अपना पुनः वर्चस्व स्थापित करने के लिए, हो सकता है आज मेरी बात से लोग इत्तफाक न रखे पर ये दौर जरुर आएगा और फिर से नये जीवन की सुरुवात होगी ये तय है I
कौन कहता है की डार्विन का सिद्धांत आज के दौर में नहीं कारगर है = "SURVIVAL OF THE FITTEST" हर जगह देखने को मिलता ही है और ये हमेशा रहेगा.
लेखक :
Er. RAM SINGH (CEO)
Mob.no :09768836002

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