शतरंज महज एक खेल जरूर है परंतु ये हमारी ज़िन्दगी में बहुत अहम किरदार निभाता है, अगर हम अपने रोज़-मर्रा की ज़िन्दगी में प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलता है, अपने घर के अंदर से बाहर की दुनिया में सब में ये खेल मौज़ूद है I 64 खानो की ये बिसात है जिसमे जनमानस बस फसा हुआ हुआ है, इन 64 खानो में मे भी दो विरोधी पक्ष जो 32 खानो में विराज़मान हैं, यानी दुनिया का आधा हिस्सा दो भागो में, अगर भारत के संदर्भ में बात की जाए तो हालात जादा बदतर, पहले इनमे मोहरो को समझे कौन कहा है, 71% आम जनता - प्यादे, हाथी - पूँजीपति वर्ग, घोड़े - उच्च वर्गों की पोषक इकाई, ऊंट - सरकारी तंत्र, वज़ीर - राजनीतिक वर्ग, राजा - प्रधान मंत्री ये सब लोगों का तंत्र है, इसकी संरचना को ध्यान से देखो तो पता चेलेगा कि मरने /हारने वालों की तादाद सबसे जादा किसकी है - प्यादे की, आज के हालात कुछ ऐसे है जिसमे ये बोल के बेवकूफ बनाया गया है खेल के सबसे अहम हिस्से ये आम लोग है, और इन्हें ये भी बोला जाता है ये सब तुम्हारा है पर छूने की अज़ादी बिल्कुल नहीं है, इनको सामने लगा के बलि का बकरा सदियों से बनते चले आ रहे हैं, यदि इस खेल के अंत में सब ख़तम भी हो जाए पर प्यादे बिना खेल अधूरा ही रहता है, अगर कोई प्यादा अपनी सीमा रेखा पार भी कर गया तो उसे तुरंत किसी अन्य रूप मे तब्दील कर दिया जाता है ठीक उसी तरह एकाद कोई आम से खास बन जाए तो अपनो से दूर रहने का षड्यंत्र रच दिया जाता है, ये सारे राजनीतिक, पूँजीपति, सरकारी उच्च तंत्र की हिमायत करने वाले सिर्फ उन्ही के लिए बने है जो राजा की श्रेणी में आते हैं और बकरा कौन हम और आप, लड़ा कौन हम और आप, मारा कौन हम और आप, सब आम जनमानस ने किया मिला क्या बाबा जी का ठूल्लू .....ये सब हुआ क्यो - सपने खरीदने के चक्कर में इसका साइड इफैक्ट हम और आप ही झेल रहे है, - जात, धर्म, उच्च, निम्न, अमीर गरीब..... कभी किसी ने देखा है दो पूँजीपति वर्ग के लोगो को लड़ते हुए... और देखेंगे भी नहीं पर हम और आप बेकार और वाहियात मुद्दे को लेके रोज़ कौन मर रहे है, आप अब खुद ही तय करे आप है कहा और किस दिशा मे है I अपने विचार जरूर प्रस्तुत करे..........
लेखक :
Er. Ram Singh
Email: dmsafe01@gmail.com
Mob.no :09768836002

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